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धरती चीखे : अर्चना प्रकाश

धरती चीखे : अर्चना प्रकाश

 

 धरती चीखे
   भू दोहन जल अप्लावन,
  दुर्लभ अति धरा का जीवन।
  सूखी नदियां कटते वन,
  सब्जियों लगते इंजेक्शन।
  फसलों में है खाद केमिकल,
  मिले कैसे शुद्ध अन्न जल।
 अधूरी वर्षा असमय होवे ,
    बेबस धरती रोये चीखें।
  सतत दोहन के जख्म कहे,
  दरारों से अन्तस् दिखलाए।
  कचरा धुँआ उद्योगों का,
  अति विषाक्त वसुधा करते।
  गर्भ धरा के सब ही सूखे,
  द्रव्य सब चट्टानों के सूखे।
  जननी सम धरा सुखदाता,
 जन्म मृत्यु का इससे नाता।
 हरियाली सिंगार धरा का,
 वृक्ष लता गुल्म सन्तति इसके।
 पंच तत्व की ये जननी ,
 आशाओं से देती दुगनी।
 मिलकर करो अर्चना इसकी,
  ये माता जड़ चेतन की।
 बाग वनों से दो सम्मान,
अंतिम शैय्या देव दनुज की।
  सबको अपना ही ये माने,
 जाति धर्म के भेद न जाने।
 आशीषों से भर लो झोली,
 देकर धरा की वृक्षों की टोली।

शारदे वन्दना

     मेरेअन्तर्मन में,ज्योतिर्मयी विचरो,
     ज्ञान रश्मियो से अन्तःउर बिखरो ।
     सुर संचित हो स्वर मेरे ,
     सरस् सर्जना गीत हो तेरे ।
      पद पद गाये तेरी महिमा,
       वर्ण वर्ण हो आर्त करुणा।
      मेरे अंतर्मन में----------------
       दीन दुखी के दर्द भुला दूँ ,
       सत्य शिव सुंदर जग कर दूँ।
       दो नयनो के दीप जलाऊं ,
       भावों की पुष्पांजलि वारूँ ।
       लेखन सतत सजीव निखरे ।
    मेरे अंतर्मन में ज्योतिर्मयी विचरो,
    ज्ञान रश्मियों से अन्तः उर बिखरो ।

बूंदों का त्योहार

 सावन बूंदों का त्योहार ,
जगाये मन मे मदिर प्यार ।
कभी रिमझिम पड़े फुहार ,
टिप टिप बरखा दे मनुहार !
 भीग रहे सब व्याकुल मन ,
 नृत्य करें खेत खलिहार ।
तन छूती नन्हीं बुँदियाँ ,
 बिरहन गाये मेघ मल्हार !
 प्यासे पोखर हर्षे उफने ,
 दादूर की टेर करे पुकार ।
अति विलक्चन कीट पतंगे ,
गोद धरा की करें दुलार !
बेटी बाबुल अंगना आये ,
 राखी करे भाई की मनुहार ।
 पपीहे की कातर बड़ी गुहार ,
 निम्बूआ की डारन झूले पड़े !
 ऊंची पेंगन गगन निहार ।
सावन बूंदों का त्योहार ,
जगाये मन मे मदिर प्यार ।

रसिक मेघ

   झुक गए धरा पर रसिक मेघ ,
   चंचल चपल चित हरन मेघ ।
        बूंद बूंद अकुएँ उगाए ,
       कण कण से अंगड़ाई उठे ।
       सिंगार करें मनुहार करें ,
      वरुण विहर वरदानी मेघ ।
   झुक गए धरा पर रसिक मेघ !
         क्रोधाकुल हहरै गरजै ,
         प्रेमरस भीगे तरुण मेघ !
        बूंदों के जनक कृष्ण मेघ,
        घिर आए गगन में विशद मेघ ।
   झुक गए धरा पर रसिक मेघ !
            कृषकों के ये धन कुबेर ,
           श्रमिकों के अनुदानी मेघ ।
         हरित क्रांति कण कण बरसै,
          सुख संदेशों के अग्रदूत मेघ।
    झुक गए धरा पर रसिक मेघ !
            घनन घन गरजै बरसै घोर,
           स्वाति बून्द तरसे चकोर ।
           नाग नागिनी नाचै मगन मोर ,
          द्युति दामिनी दमकै तड़ित मेघ ।
   झुक गए धरा पर रसिक मेघ,
    चंचल चपल चित हरन मेघ ।

                      डॉ अर्चना प्रकाश
                लखनऊ

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