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शब यात्रा : अभिषेक जैन

 
शब यात्रा : अभिषेक जैन

शब यात्रा

      रामू ने भी अपने पिता को कांधा देने से मना कर दिया। क्योंकि उनकी मौत कोरोना से हुई थी। सचमुच उस दिन मैंने सोचा यह बीमारी ने खत्म कर दिए हैं रिश्ते और मर्यादा भी लोगों के अंदर दया खत्म सी हो गयी है। देखो तो कैसा लड़का है अपने पिता का दास संस्कार भी नहीं किया। शहर के रहीम चाचा ने रामू को देखकर ये उलहाना दिया पर रामू की मजबूरी को समझने को भी तैयार न था। उस समय के हालात ही कुछ ऐसे थे कि चाहकर रामू कुछ नहीं कर पा रहा था। शासन से उसने खूब कहां कि मेरे पिता की लाश तो दे दो। मगर कलेक्टर साहब ने कहा
तुम्हारे पिता की मौत जिस बीमारी से हुईं हे ना। उसमें लाश नहीं दे पायेंगे।

      रामू खुद को कोसता रहा कि मैं कैसा पुत्र हूं मुझे कभी माफ नहीं करेंगे मेरे पिता उसकी आंखों के सामने वो चित्र बार बार आ रहा था कि बचपन के दिनों में मैं उनके कांधों पर चढ़ कर मेला देखने जाता था और वो मुझे किस शान के साथ अपने कांधों पर बिठाया करते थे लेकिन अब वो एहसान चुकाने का वक्त आया तो मजबूरी देखो मेरी तभी रामू के घर के बाहर वो शब गाड़ी आ जाती है जिसमें उसके पिता का शब रखा था. वो खूब रो रहा था मगर उसके आंसू किसी को दिख नहीं रहें थे उसमें नगर पालिका के लोग बैठे थे जो पीपी किट पहने थे और वो ही श्मशान घाट की तरफ चले जा रहे थे. उसने दिन का वक्त उसमें बहुत भारी था. वो चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा था और अपनी मायूसी छुपा नहीं पा रहा था। और उसका साथ मौसम भी दे रहा था।
 
       मानो उसका भी मन भर आया था।और वो भी दुःखी रामू के साथ फूट फूट कर रोने लगा। और इतना रोया कि उसे ठीक होने में चार घंटे लगें तब इंतजार कर रहे थे सरकारी बाबू उनको उनके पिता का दाह संस्कार जो‌ करना था. तभी सूरज निकला मगर उसमें भी रोशनी कम थी। शायद वो भी उदास था रामू के दुखों के पहाड़ को देखकर
और क्यो न हो एक पिता दूसरे बेटे के दुःख को भली भांति समझता था। और वो भी दुखी था। और उसने तभी तो चार घंटे लगाएं खुद को संभालने के लिए फिर सबकुछ भूलकर उसे अपना फर्ज निभाना था। संसार को रोशनी देने का। और रामू को संभालने का। जो उसको भली-भांति आता था।
 

कैद

      कब बाहर जा पाऊंगा मैं परेशान हो गया हूं। घर की रोज रोज के हंगामों से इन बच्चों की शैतानियां कम ही नहीं होती और अब तो पढ़ाई से भी आजादी मिल चुकी है. शासन का ये स्कूल बंद करने का निर्णय बहुत ग़लत है. बबलू के पिता जी ने गुस्से में बड़बड़ाते हुए कहा। उन दिनों वो बहुत परेशान हो चलें थे। घर पर पूरा दिन बिताना उनको बिल्कुल भी पसंद नहीं था। और शाम को बाहर जाने का मन था लेकिन तभी पुलिस की गाड़ी निकल थी जो उन्हें वापिस घर भेज देती थी। जैसे बिना बात की उन्हें कोई सजा मिल रही हो।

       घर पर उनका मुंह बना रहा है। किसी से कोई बात भी करते तो चिल्लाने लगते कभी कभी सब्जी दाल में भी गलतियां निकालने लगते कि आज दाल इतने पतली क्यो है और मैं रोज रोज लोकी नहीं खा सकता। धर्म पत्नी कहती इनके नखरे लग चलते रहते हैं. मैं सुबह से खतिर में लगीं हूं ये नहीं कोई तारीफ़ ही कर दें। मेरी तो कोई कद्र ही नहीं करते ‌‌‌पहले यही दाल बड़े चाव से खा लिए करते थे लेकिन अब तो बड़े नखरे करते हैं.
 
       मोदी जी ने हमारे बारे में भी नहीं सोचा कि इनको पच्चास दिन कैसे झेलेंगे। अब तो खोल दो महाराज वरना मैं पागल हो जाऊंगी और फिर मेरे बच्चों का क्या होगा? इस मंहगाई ने पहले ही कमर तोड दी है और इस कैद ने जिंदा ही मार दिया है। तभी आवाज आई वैक्सीन लगवाओ, मैं कैसे लगवाऊं इस मुई वैक्सीन ने कितनों को बीमार किया है. अगर मैं हो गई तो मेरे परिवार का क्या होगा?

 परेशान

     सचमुच बहुत परेशान हैं बातों से भी अंदाजा लगाया जा सकता है बातों बातों में किसी से भी झगड़ने लगता है. लोग उससे बातों करने में घबराने लगते थे ‌‌ न जाने क्या कहने लगे ऐसे लोगों का कोई भरोसा थोड़ी होता है। उनका
मूड कब बदल जाए इसका अंदाजा खुद कोई नहीं लगा सकता।कभी खाने में झगड़ने लगते कहते कि मैं रोज रोज लौकी नहीं खा सकता। तो कभी बच्चे घूमने जाएं और उनको थोड़ी देर हो जाएं तो कहेंगे देखो अपने बच्चें हाथ से निकल गए हैं पिता को बताना भी ज़रूरी नहीं है। समझते हैं, एक वो ही छोटे हैं कभी हम भी थे. 

     पर हम अगर घर से बाहर जाते तो बाबू जी को बताकर जातें थे ऐसे हैं हमारे पड़ोसी राम मोहन जी जिनको गुस्सा करने में पीएचडी की मानद उपाधि हासिल है। उनकी धर्म पत्नी उनके सर्वभाव के एकदम विपरीत है, गुस्सा कभी उनको नहीं आता। एकदम शांत और उम्मीद को न छोड़ने वाली है। कभी भी उनको परेशान नहीं देखा जैसे दुःख उनके यहां जाने का रास्ता भूल गया हो। सदा चेहरे पर मंद मंद मुस्कान रहतीं हैं। और सभी से बढ़े प्यार से बोला करती है। जो भी उनसे एक बार उनसे बातें कर लें उसको शक्कर खाने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। लोग बहाने बनाकर उनसे बातें करने का मौका ढूंढा करते थे। और अपनी हर परेशानी को पल भर सुलझा लेती थी जीवन में परेशानी सबके हिस्से में आती है। तो क्या जरूरी है कि मुंह को लटका लिया जाएं या फिर उसका सामना किया जाएं ऐसे लोग कभी अकेले नहीं पड़ते हैं। उनको लोगों से जुड़ना आता है। और वो ही जिंदगी जीते हैं। और कुछ लोग सिर्फ सांसों को लेना जिंदगी समझ लेते है.  
 

जमीन

      तुम्हे वो लोग यहां जमने ही नहीं देंगे जिनसे तुम रोज टकरातीं हो बिटिया पापा ने उसे बड़े प्यार से समझाया. मगर रमेश की बातों से लग रहा था कि वो भी उसके सच बोलने के हनुर को पचा नहीं पा रहा था।और उसे दबाने के लिए तरह तरह की बातें करता उस पर ताने को कसता। लेकिन पापा झूठ बोलना भी तो अच्छा नहीं होता उसने बड़े प्यार से कहा मगर तुम पुरुष प्रधान समाज में रहतीं हो जहां बेटियों को इतनी आज़ादी नहीं दी जाती कि वो उन्हें रोकें टोके बात बात पर उन्हें गलत ठहराए. अरे पापा आप किस ज़माने में जीते हैं, अब बेटियां किसी से कम नहीं है। वो यहां जीवन जीने का उतना ही अधिकार रखतीं हैं, जितना बेटे रखतें हैं.
 
      आजकल तो फौज में हम भी तो कांधों से कांधों मिलकर चलते हैं। हम किसी मामले में कम नहीं है आपने किरण बेदी को तो देखा होगा वो तो ऐसी अफसर थी जो कभी भी पुरुषों से किसी मामलों में कम नहीं थी. ज़मीन का ज्ञान हमें भी है और हमारे पैर भी नीचे ही है. उस दिन रमेश को अपनी गलती का एहसास हुआ और ये होना अच्छी बात है। और बेटी को देखकर मुस्कुराता रहा. 

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